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मुंशी प्रेमचंद्र

 जीवन परिचय प्रेमचंद का जन्म  31  जुलाई  1980  को  वाराणसी  जिले (उत्तर प्रदेश) के  लमही  गाँव में एक  कायस्थ  परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम आनन्दी देवी तथा पिता का नाम मुंशी अजायबराय था जो लमही में डाकमुंशी थे। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। प्रेमचंद (प्रेमचन्द) की आरम्भिक शिक्षा  फ़ारसी  में हुई। प्रेमचंद के माता-पिता के सम्बन्ध में रामविलास शर्मा लिखते हैं कि- "जब वे सात साल के थे, तभी उनकी माता का स्वर्गवास हो गया। जब पन्द्रह वर्ष के हुए तब उनका विवाह कर दिया गया और सोलह वर्ष के होने पर उनके पिता का भी देहान्त हो गया।" इसके कारण उनका प्रारम्भिक जीवन संघर्षमय रहा। प्रेमचंद के जीवन का साहित्य से क्या संबंध है इस बात की पुष्टि रामविलास शर्मा के इस कथन से होती है कि- "सौतेली माँ का व्यवहार, बचपन में शादी, पण्डे-पुरोहित का कर्मकाण्ड, किसानों और क्लर्कों का दुखी जीवन-यह सब प्रेमचंद ने सोलह साल की उम्र में ही देख लिया था। इसीलिए उनके ये अनुभव एक जबर्दस्त सचाई लिए हुए उनके कथा-साहित्य में झलक उठे थे।"उनकी बचपन...

गद्य की प्रमुख विधा नाटक का परिचय और विशेषताये

    नाटक का अर्थ ‘ नाटक ‘ अथवा ‘ दृश्य काव्य ‘ साहित्य की अत्यंत प्राचीन विधा है। संस्कृत साहित्य में इसे ‘ रूपक ‘ नाम भी दिया गया है। नाटक का अर्थ है ‘ नट ‘ | कार्य अनवीकरण में कुशल व्यक्ति संबंध रखने के कारण ही विधा में नाटक कहलाते हैं। वस्तुतः नाटक , साहित्य की वह विधा है , जिसकी सफलता का परीक्षण रंगमंच पर होता है। किंतु रंगमंच युग विशेष की जनरुचि और तत्कालीन आर्थिक व्यवस्था पर निर्भर होता है इसलिए समय के साथ  नाटक के तत्व व विशेषताएँ   अब हम नाटक के तत्वों को विस्तार से समझेंगे। और प्रत्येक भाग को उदाहरण सहित समझेंगे। 1. कथावस्तु – कथावस्तु को ‘नाटक’ ही कहा जाता है अंग्रेजी में इसे ‘प्लॉट’ की संज्ञा दी जाती है जिसका अर्थ आधार या भूमि है। कथा तो सभी प्रबंध का प्रबंधात्मक रचनाओं की रीढ़ होती है और नाटक भी क्योंकि प्रबंधात्मक रचना है इसलिए कथानक इसका अनिवार्य है। भारतीय आचार्यों ने नाटक में तीन प्रकार की कथाओं का निर्धारण किया है – १ प्रख्यात २ उत्पाद्य ३ मिस्र प्रख्यात कथा। प्रख्यात कथा – प्रख्यात कथा इतिहास , पुराण से प्राप्त होती है। जब उत्पाद्य कथा कल्पना प...

सगुण भक्ति काव्य धारा

  सगुण भक्ति काव्य धारा की विशेषताएं/प्रवृत्तियाँ –  हिन्दी साहित्य   के भक्तिकाल में भक्ति की दो धाराएं प्रवाहित हुईं- निर्गुण तथा सगुण। निर्गुण सन्तों में भक्ति की अपेक्षा ज्ञान की प्रधानता है। जबकि सूफी कवियों में प्रेम का अत्यधिक महत्त्व है, पर दोनों के यहां ईश्वर निर्गुण है। मध्यकालीन सगुण संप्रदाय वैष्णव धर्म से पोषण प्राप्त करता है। इस संप्रदाय की दोनों शाखाओं रामभक्ति धारा और कृष्णभक्ति धारा में ईश्वर सगुण है।इन्होंने ज्ञान, कर्म और भक्ति में से भक्ति में से भक्ति को ही अपने उपजीव्य के रूप में ग्रहण किया। हिन्दी के वैष्णव भक्त कवियों ने ज्ञान की अवहेलना तो नहीं की पर उसे भक्ति जैसा समर्थ भी नहीं बताया। ज्ञान तारक तो है पर वह कष्ट साध्य और कृपाण की धार के समान है। इन भक्ति कवियों से पूर्व सिद्ध अपनी दुःख साध्य गुह्य साधना-पद्धतियों से जनसामान्य को बुरी तरह से विस्मित कर चुके थे। नाथपन्थी अपनी योग प्रणाली द्वारा लोक को चमत्कृत करने में अपने-आपको कृतकृत्य मान रहे थे और इधर निर्गुणीय सन्तों की वाणी कर्मकांड का घोर तिरस्करण करती हुई परंम्परा के प्रति अनास्था को जन्म दे...

निर्गुण काव्य की विशेषता

   निर्गुण काव्य की विशेषता * निजी धार्मिक सिद्धांतों का अभाव  *आचार्य पक्ष की प्रधानता  *गुरु के प्रति श्रद्धा * निम्न जाति के कवि  *सामाजिक कुरीतियों के विरोधी  *शिक्षा की कमी  *काव्य रूप  *भाषा  *निर्गुण भक्ति धारा के कवि प्रमुख कवि   निजी धार्मिक सिद्धांतों का अभाव   संत साहित्य में निजी सिद्धांतों का अभाव है ब्राह्म, जीव, माया संसार आदि के संबंध में इन कवियों ने जिन बातों का वर्णन किया है बे  पूर्ववर्ती आचार्यों और कवियों की देन है  । आचार्य पक्ष की प्रधानता  संत कवियों ने अपने कार्यों में असहयोग अनाचार और आडंबर का विरोध किया है इनमें खानपान ,आचार विचार ,शुद्धता और सदाचार को विशेष महत्व दिया गया है इनकी सहज भावना और सहज आचारों को पालन करने की साधना है इन्हीं आंकड़ों के आधार पर अनेक पंथ बने हैं आज भारत में नानक कबीर पंथ दादू आदि बने हैं इनमें मौलिक एकता है।    गुरु के प्रति श्रद्धा   संत कवियों ने अपनी रचनाओं में गुरु को सबसे ऊंचा स्थान दिया है इन्होंने ईश्वर प्राप्ति हेतु गुरु को आवश्यक बताया ...

निर्गुण काव्यधारा

 हिंदी साहित्य में संत कवि जिस विचारधारा को लेकर अपनी वाणी की रचना में प्रवृत्त हुए हैं उनका मूल सिद्ध कथा नाथ साहित्य में है कई संत कवियों ने अपनी भाव विभोर वाणी द्वारा आध्यात्मिक साधना तथा भक्ति की उत्थान का कार्य किया।   संतो ने  मानव जीवन पर जोर देते हुए उस को सार्थक करने हेतु सत्संग भजन कीर्तन नाम स्मरण पूजन अर्चन गुरु साधना महत्व योग महिमा माया निरूपण संसार की असारता  को दर्शाया है।  यह बातें उन्होंने सरल शब्दों में सहज रूप से कहीं हैं।        मानव स्वभाव में स्थापित करने और उसे अपनाने के लिए कई संतों ने निर्गुण सगुण साधना को अपनाया इसमें अवतारवाद को स्वीकार कर लेने के बाद फलस्वरुप को सगुण साधना को ऐसा साकार आलंबन मिल जाता है  जिसके कारण उसे सामान्य अशिक्षित व्यक्ति ही भी सहज ही स्वीकार कर सकता है निर्गुण साधना का आलंबन निराकार है फल स्वरुप वह जनसाधारण के लिए नहीं हो सकता सामाजिक उपयोगिता कि दृष्टि से सगुण साधना निर्गुण साधना की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है किंतु इस आधार पर निर्गुण साधना की सत्ता या महत्व के बारे में संदेह नहीं किया ...