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Showing posts from May, 2021

गद्य की प्रमुख विधा नाटक का परिचय और विशेषताये

    नाटक का अर्थ ‘ नाटक ‘ अथवा ‘ दृश्य काव्य ‘ साहित्य की अत्यंत प्राचीन विधा है। संस्कृत साहित्य में इसे ‘ रूपक ‘ नाम भी दिया गया है। नाटक का अर्थ है ‘ नट ‘ | कार्य अनवीकरण में कुशल व्यक्ति संबंध रखने के कारण ही विधा में नाटक कहलाते हैं। वस्तुतः नाटक , साहित्य की वह विधा है , जिसकी सफलता का परीक्षण रंगमंच पर होता है। किंतु रंगमंच युग विशेष की जनरुचि और तत्कालीन आर्थिक व्यवस्था पर निर्भर होता है इसलिए समय के साथ  नाटक के तत्व व विशेषताएँ   अब हम नाटक के तत्वों को विस्तार से समझेंगे। और प्रत्येक भाग को उदाहरण सहित समझेंगे। 1. कथावस्तु – कथावस्तु को ‘नाटक’ ही कहा जाता है अंग्रेजी में इसे ‘प्लॉट’ की संज्ञा दी जाती है जिसका अर्थ आधार या भूमि है। कथा तो सभी प्रबंध का प्रबंधात्मक रचनाओं की रीढ़ होती है और नाटक भी क्योंकि प्रबंधात्मक रचना है इसलिए कथानक इसका अनिवार्य है। भारतीय आचार्यों ने नाटक में तीन प्रकार की कथाओं का निर्धारण किया है – १ प्रख्यात २ उत्पाद्य ३ मिस्र प्रख्यात कथा। प्रख्यात कथा – प्रख्यात कथा इतिहास , पुराण से प्राप्त होती है। जब उत्पाद्य कथा कल्पना प...

सगुण भक्ति काव्य धारा

  सगुण भक्ति काव्य धारा की विशेषताएं/प्रवृत्तियाँ –  हिन्दी साहित्य   के भक्तिकाल में भक्ति की दो धाराएं प्रवाहित हुईं- निर्गुण तथा सगुण। निर्गुण सन्तों में भक्ति की अपेक्षा ज्ञान की प्रधानता है। जबकि सूफी कवियों में प्रेम का अत्यधिक महत्त्व है, पर दोनों के यहां ईश्वर निर्गुण है। मध्यकालीन सगुण संप्रदाय वैष्णव धर्म से पोषण प्राप्त करता है। इस संप्रदाय की दोनों शाखाओं रामभक्ति धारा और कृष्णभक्ति धारा में ईश्वर सगुण है।इन्होंने ज्ञान, कर्म और भक्ति में से भक्ति में से भक्ति को ही अपने उपजीव्य के रूप में ग्रहण किया। हिन्दी के वैष्णव भक्त कवियों ने ज्ञान की अवहेलना तो नहीं की पर उसे भक्ति जैसा समर्थ भी नहीं बताया। ज्ञान तारक तो है पर वह कष्ट साध्य और कृपाण की धार के समान है। इन भक्ति कवियों से पूर्व सिद्ध अपनी दुःख साध्य गुह्य साधना-पद्धतियों से जनसामान्य को बुरी तरह से विस्मित कर चुके थे। नाथपन्थी अपनी योग प्रणाली द्वारा लोक को चमत्कृत करने में अपने-आपको कृतकृत्य मान रहे थे और इधर निर्गुणीय सन्तों की वाणी कर्मकांड का घोर तिरस्करण करती हुई परंम्परा के प्रति अनास्था को जन्म दे...