Posts

Showing posts from April, 2021

निर्गुण काव्य की विशेषता

   निर्गुण काव्य की विशेषता * निजी धार्मिक सिद्धांतों का अभाव  *आचार्य पक्ष की प्रधानता  *गुरु के प्रति श्रद्धा * निम्न जाति के कवि  *सामाजिक कुरीतियों के विरोधी  *शिक्षा की कमी  *काव्य रूप  *भाषा  *निर्गुण भक्ति धारा के कवि प्रमुख कवि   निजी धार्मिक सिद्धांतों का अभाव   संत साहित्य में निजी सिद्धांतों का अभाव है ब्राह्म, जीव, माया संसार आदि के संबंध में इन कवियों ने जिन बातों का वर्णन किया है बे  पूर्ववर्ती आचार्यों और कवियों की देन है  । आचार्य पक्ष की प्रधानता  संत कवियों ने अपने कार्यों में असहयोग अनाचार और आडंबर का विरोध किया है इनमें खानपान ,आचार विचार ,शुद्धता और सदाचार को विशेष महत्व दिया गया है इनकी सहज भावना और सहज आचारों को पालन करने की साधना है इन्हीं आंकड़ों के आधार पर अनेक पंथ बने हैं आज भारत में नानक कबीर पंथ दादू आदि बने हैं इनमें मौलिक एकता है।    गुरु के प्रति श्रद्धा   संत कवियों ने अपनी रचनाओं में गुरु को सबसे ऊंचा स्थान दिया है इन्होंने ईश्वर प्राप्ति हेतु गुरु को आवश्यक बताया ...

निर्गुण काव्यधारा

 हिंदी साहित्य में संत कवि जिस विचारधारा को लेकर अपनी वाणी की रचना में प्रवृत्त हुए हैं उनका मूल सिद्ध कथा नाथ साहित्य में है कई संत कवियों ने अपनी भाव विभोर वाणी द्वारा आध्यात्मिक साधना तथा भक्ति की उत्थान का कार्य किया।   संतो ने  मानव जीवन पर जोर देते हुए उस को सार्थक करने हेतु सत्संग भजन कीर्तन नाम स्मरण पूजन अर्चन गुरु साधना महत्व योग महिमा माया निरूपण संसार की असारता  को दर्शाया है।  यह बातें उन्होंने सरल शब्दों में सहज रूप से कहीं हैं।        मानव स्वभाव में स्थापित करने और उसे अपनाने के लिए कई संतों ने निर्गुण सगुण साधना को अपनाया इसमें अवतारवाद को स्वीकार कर लेने के बाद फलस्वरुप को सगुण साधना को ऐसा साकार आलंबन मिल जाता है  जिसके कारण उसे सामान्य अशिक्षित व्यक्ति ही भी सहज ही स्वीकार कर सकता है निर्गुण साधना का आलंबन निराकार है फल स्वरुप वह जनसाधारण के लिए नहीं हो सकता सामाजिक उपयोगिता कि दृष्टि से सगुण साधना निर्गुण साधना की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है किंतु इस आधार पर निर्गुण साधना की सत्ता या महत्व के बारे में संदेह नहीं किया ...