निर्गुण काव्य की विशेषता
निर्गुण काव्य की विशेषता
* निजी धार्मिक सिद्धांतों का अभाव
*आचार्य पक्ष की प्रधानता
*गुरु के प्रति श्रद्धा
* निम्न जाति के कवि
*सामाजिक कुरीतियों के विरोधी
*शिक्षा की कमी
*काव्य रूप
*भाषा
*निर्गुण भक्ति धारा के कवि प्रमुख कवि
निजी धार्मिक सिद्धांतों का अभाव
संत साहित्य में निजी सिद्धांतों का अभाव है ब्राह्म, जीव, माया संसार आदि के संबंध में इन कवियों ने जिन बातों का वर्णन किया है बे पूर्ववर्ती आचार्यों और कवियों की देन है ।
आचार्य पक्ष की प्रधानता
संत कवियों ने अपने कार्यों में असहयोग अनाचार और आडंबर का विरोध किया है इनमें खानपान ,आचार विचार ,शुद्धता और सदाचार को विशेष महत्व दिया गया है इनकी सहज भावना और सहज आचारों को पालन करने की साधना है इन्हीं आंकड़ों के आधार पर अनेक पंथ बने हैं आज भारत में नानक कबीर पंथ दादू आदि बने हैं इनमें मौलिक एकता है।
गुरु के प्रति श्रद्धा
संत कवियों ने अपनी रचनाओं में गुरु को सबसे ऊंचा स्थान दिया है इन्होंने ईश्वर प्राप्ति हेतु गुरु को आवश्यक बताया है सद्गुरु अनंत है वह अपनी आध्यात्मिक शक्ति से सारे जीव को ब्रह्मा का अलौकिक दर्शन कराता है।
निम्न जाति के कवि
निर्गुण काव्यधारा के अधिकांश कवि निम्न जाति में उत्पन्न हुए समाज के निचले स्तर की जातियों में जन्म लेने के कारण उन्हें ऊंच-नीच संबंधी कटु अनुभव था इन कवियों में कबीर जुलाहा, रैदास चमार, , सेन नाई दादू धुनिया, सदन कसाई ,नाभादास डोम के घर में जन्मे थे ।
सामाजिक कुरीतियों के विरोधी
इन कवियों ने एक स्वर से जाति पाति आदि कुरीतियों का व्यापक पैमाने पर विरोध किया समाज के निचले स्तर से आने के कारण इन कवियों के लिए ज्ञान प्राप्ति के दरवाजे बंद थे ज्ञान की प्यास बुझाने हेतु इन कवियों ने अनेक दरवाजे खटखटाया किंतु कोई भी पंडित या महात्मा ने शिक्षा देने के लिए तैयार नहीं था।
शिक्षा की कमी
संत कवि अधिक पढ़े लिखे ना थे कबीर के संबंध में तो यहां तक कहा जाता है मसि कागद छयो नहीं, कलम गयो नहीं हाथ ।।इसका परिणाम यह हुआ है ईंन कवियों के ज्ञान का भंडार पंडितों महात्माओं संतो तथा स्थान ब्राह्मण की देन नहीं है इनके काव्य में मन की गुनी कान की सुनी और आंख की देखी बातों की चर्चा है ।
काव्य रूप
निर्गुण धारा का समस्त साहित्य मुक्तक रूप में लिखा गया है इनमें प्रबंध का अभाव है अधिकांश रचनाएं दोहे और पद में लिखी गई है।
भाषा
संत कवियों की भाषा खिचड़ी सद्गुणी है यह एक स्थान से दूसरे स्थान तक भटक भटक कर स्थान स्थान की भाषा ग्रहण करते थे इस कारण इनका भाषा भंडार विविधता से भरा था भाषा अनगढ़ और परिमार्जित है कहीं-कहीं गूढ़ ज्ञान के कारण भाषा की क्लिष्ट हो गई है किंतु यह सत्य है इन कवियों का भाषा पर जबरदस्त अधिकार है।
निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि
ज्ञानाश्रई शाखा की संत काव्य धारा में रामानंद का नाम सर्वोपरि है संत मत के प्रचार का श्रेय इन्हीं को है इनके शिष्य कबीर ने ज्ञानाश्रई शाखा को अमर बना दिया निम्न वर्ग में उत्पन्न साधक रैदास जी इसी मार्ग के शिष्य थे नानक पंथ के प्रवर्तक गुरु नानक देव जी इसी मार्ग
के अनुयाई बने इसके अतिरिक्त दादू दयाल, हरिदास लाल, दास मलूक दास, धर्मदास, सुंदर दास आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।
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